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Father to a Son

                   

  1. विचार बड़े बड़े करना , मगर छोटी छोटी खुशियों को भी मानते रहना। 
  2. व्यक्ति घिस जाए उसकी परवाह नहीं, मगर व्यक्ति मिट ना जाए वह महत्व का है। 
  3. अच्छी अच्छी पुस्तको को सहेज कर रखना ,फिर चाहे ऐसा क्यों न लगे की ये पढ़ी नहीं जायेगी। 
  4. किसी के भी प्रति आशा खोना मत , क्योंकि चमत्कार रोज होते रहते है। 
  5. हर बात में उत्तमता का आग्रह रखना और उसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना। 
  6. तंदुरस्ती अपने आप ठीक रहेगी , ऐसा कभी मत समझना। 
  7. अपनी नजर के सामने हमेशा कुछ सुन्दर रखना , फिर भले ही वह एक प्याले में रखा फूल ही हो। 
  8. मुझसे यह काम थोडा सा ही होगा ऐसा लगे ,इसलिए उस काम को नहीं करना ऐसा मत मानना ,जो थोडा भी तुमसे होता है वह जरुर करना। 
  9. सम्पूर्णता के लिए नहीं , श्रेष्ठता के लिए कोशिश करना। 
  10. जो तुच्छ है उसे पहचानना सीखे ,फिर उसकी अवगणना करे। 
  11. घिस जाना मगर मिट मत जाना , अपने आप को निरंतर सुधारते रहने की प्रतिज्ञा करना। 
  12. हार में खेलदिली ,जीत में खेलदिली बताना , प्रशंसा सबके सामने करना ,टीका अकेले में करना। 
  13. तेरे परिवार को तू कितना चाहता है उसे रोज तेरे शब्दों द्वारा ,स्पर्श द्वारा ,तेरी विचार शीलता द्वारा बताते रहना। 
  14. अपने आप में परिवर्तन लाने की अपनी शक्ति का अंदाजा कभी कम मत लगाना. मगर दूसरो में परिवर्तन लाने की अपनी शक्ति का अंदाजा बहुत ज्यादा मत मानना। 
  15. कब चुप रहना उसका ख्याल रखना और और कब चुप नहीं रहना उसका भी ख्याल रखना। 
  16. गन्दगी के सामने हमेशा युद्धरत रहना। 
  17. दुसरो की सफलता में उत्साह बताना और दुसरे लोगो को उनको खुद का महत्व पता चले ऐसे मौके ढूंढ़ते रहना। 
  18. अपने निर्वाह के लिए मेहनत करते हर व्यक्ति के साथ सम्मान से पेश आना ,फिर चाहे भले वह कार्य छोटा ही क्यों ना हो। 
  19. इस प्रकार जीवन जीना की तुम्हारे बालक जब भी इमानदारी ,निष्ठा और प्रामाणिकता का विचार करे तब उन्हें तुम याद  आओ। 
  20. जिन्हें उस बात की कभी खबर भी ना लगे ऐसा हो ,ऐसे लोगो के लिए कुछ अच्छा करते रहने की आदत डालना। 
  21. गुलाबो की सुगंध ले सको , इतनी फुरसत रखना। 
  22. दिमाग मजबुत रखना , दिल नरम रखना। 
  23. कौन सही है ,उसे जानने में वक्त कम लगाना और क्या सही है उसे जानने में ज्यादा। 
  24. जो गाँठ छुट सकती है उसे कभी मत काटना। 
  25. बड़े युद्ध जितने के लिए छोटी छोटी लड़ाईयाँ हारना सीखना। 
  26. हर चीज जिस हालत में हमे मिली है , उससे अच्छी हालत में उसे रखना सीखे। 
  27. सफल लग्न जीवन का आधार दो बातो पर निर्भर है.  योग्य पात्र ढूंढना और योग्य पात्र बनना। 
  28. समय नहीं मिलता ऐसा मत कहना क्योंकि एक दिन में तुम्हे भी उतने ही घंटे मिलते है जितने मदर टेरेसा , जे आर डी टाटा ,आइन्सताईना ,महात्मा गाँधी आदि को। 
  29. सुख का आधार संपति ,सत्ता या शौर्य  पर नहीं , मगर जिन्हें हम चाहते और सम्मान करते है उन लोगो के साथ अपने संबंधो पर है। 
  30. तुम्हे मान मिले उसमे दूसरो को भी सहभागी बनाना। 
  31. अपने बच्चो को नियमित कुछ पढ़ कर सुनाना , गीत सुनाना और हमेशा उन्हें सुनना। 
  32. "मुझे इसकी खबर नहीं" ऐसा कहते डरना मत, "मुझसे भूल हो गई" ऐसा कहते हिचकिचाना मत,"मै शर्मिंदा हूँ " ऐसा कहते डगमगाना मत। 
  33. कभी कभी असफल होने की तैयारी रखना।  

बच्चे वही सीखते है, जो जीते है.




अगर बच्चा आलोचना के माहोल में रहता है तो निंदा करना सीखता है
अगर बच्चा प्रशंसा के माहोल में रहता है तो तारीफ़ करना सीखता है।
अगर बच्चा लड़ने के माहोल में रहता है तो झगड़ना सीखता है।
अगर बच्चा सहनशीलता के माहोल में रहता है तो धैर्य सीखता है।
अगर बच्चा बेहूदे और खिल्ली उड़ाने वाले माहोल में रहता है संकोच करना सीखता है।
अगर बच्चा प्रोत्साहन के माहोल में रहता है तो आत्म विस्वास सीखता है।
अगर बच्चा शर्मिंदगी के माहोल में रहता है तो खुद को दोषी मानना सीखता है।
अगर बच्चा समर्थन के माहोल में रहता है तो खुद को पसंद करना सीखता है।
अगर बच्चा न्याय संगत माहोल में रहता है तो इन्साफ करना सीखता है।
अगर बच्चा सुरक्षा के माहोल में रहता है तो भरोसा करना सीखता है।
अगर बच्चा सहमती और दोस्ती के माहोल में रहता है तो दुनिया में प्यार ढूंढना सीखता है।

संकलित कविता

पूत कपूत तो क्यों धन संचे,पूत सपूत तो क्यों धन संचे

जिस स्थितीमें इंसान आ जाता है, उस स्थिती को मानने की तैयारी हो तो दुःख और पीड़ा की ज्यादातर वेदना चली जाती है। सुख और दुःख से निर्लेप बन कर जो अपनी खुशमिजाजी बनाए रखता है ,आखिर में जीत उसी की होतीहै। इंसान की सुख और दुःख में खुश रहने की मस्त मिजाजी उसे ऐसा सुख प्राप्त करवाता है, जिसे कोई ऑर व्यक्ति या परिस्तिथि उससे छीन नहीं सकती ।
पनी जरुरत से ज्यादा धन इकठ्ठा करने वाले व्यक्ति के दो गणित मुख्य रहते है। 


१).संचय किया हुआ धन उसे भविष्य की चिंताओं से मुक्त करेगा , २)जब खुद वह इस दुनिया छोड़ कर चला जाएगा तब वह धन उसके पुत्र पुत्रियो के काम आयेगा -


विष्य के लिए इंसान कुछ - न-कुछ इंतजाम करे तो इसके इस व्यावारिक बुध्हि का विरोध नहीं किया जा सकता। मगर इंसान का अनुभव तो ऐसा बताता है की भविष्य तो किसी की कल्पना या योजना अनुसार किसी के सामनेनहीं आता है। जब भविष्य , वर्तमान बन सामने आता है , तब एकदम अलग ही परिस्तिथि सामने आती है। जोविचार कर इंतजाम किया हो वो बने ही नहीं ऑर जो नहीं विचारा हो वहीबन जाता है


ब दूसरी बात संतानों की करे - मेरे जाने के बाद संचय किया हुआ धन ,मिल्कत आदि मेरे पुत्रो के काम आएगाऐसे सुंदर वहम में इंसान जीता है। अपने संतानों के लिए कुछ छोड़ जाने की भावना पिताको हो वह अच्छी बात है, मगर वह धन संतान को कब कीस प्रसंग में काम ऐसा कोई नहीं जान सकता । संतान वडीलो का त्र्रुण स्वीकारकरेंगे की नहीं , वह बात भी अनुमान बन जाती है। क्योंकि संतानों का उनका अपना जीवन होता है। उनका अलगभविष्य होता है.ऑर जिन्दगी के बारे में उनके स्वतंत्र विचार होते है । एक युवक ने मजाक में कहाँ, . "मेरे पिता ,पुत्र के लिए बहुत सारा धन छोड़ कर जा रहा हूँ , ऐसे ख्याल के साथ गए ,मगर मेरे पिता मेरे लिए जो धन छोड़ कर गए उससे अनेक गुना धन तो मैंने खुद कमाया है.ऑर जो कुछ भी कमाया उसमे मेरे पिताजी के धन का बिल्कुल उपयोग नहीं कियाउन्हें अच्छा लगे या ना लगे ,मगर उनका दिया हुआ एक वारसा मुझे याद रखने जैसा लगता है वह है -डायबीटीस का रोग । " माँ- बाप को लगता है की अपने बालको की जिन्दगी की सब व्यवस्था अपने हाथ सेकर के जाए ,मगर ऐसा सोचा हुआ अक्सर होता नहीं है । उन्हें नहीं मालुम की उनकी संतान उनकी व्यवस्था कोबदल डालेगा । बड़े महल छोड़ कर जाने वाले राजाओं ने कल्पना की होगी की उनके वंशज सुख से रहेंगे ।परिस्तिथि बदल जाने से उनमे कइयो ने महल को होटलों में बदल दिया है
माँ - बाप अपने पुत्रो को बहुत कुछ दे सकते है , व देते भी है। शरीर उनका ही दिया हुआ है.प्रेम की एक बड़ी वसीयतदे सकते है। जिन्दगी में आने वाली
समस्याओं को सुलझाने की सूझ -बुझ ऑर सुख दुःख की परिस्तिथि का सामनाकरने की हिम्मत भी वे अपने वसीयत में दे सकते है। रुपये की वसीयत से भी ज्यादा महत्वपूर्ण ऑर कीमती होऐसा बन सकता है

पूत सपूत तो क्यों धन संचे ?
पूत कपूत तो क्यों धन संचे ?