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Positive Attitude-Action plan
सकारात्मक नजरिया कायम रखने के लिए "एक्सन प्लान"
# आप ऊपर दिए गए कदमो का इस्तेमाल घर,दफ्तर,समाज और धर्म क्षेत्रो में कैसे कर सकते है।
# आप अपनी जिन बातो में बदलाव लाना चाहते है उनकी सूची बनाए।
# हर बदलाव से खुद पर और दूसरो पर पड़ने वाले फायदों की सूची बनाए।
# एक टाइम टेबल बनाए और बदलाव लाने के लिए खुद को कमिट करे।
- अपनी सोच बदले और अच्छाई खोजे।
- हर काम को तुरंत करने की आदत डाले।
- अहसानमंद होने का नजरिया बनाए।
- लगातार ज्ञान हासिल करने की आदत डाले।
- अच्छे स्वाभिमान का निर्माण करे।
- बुरे असर से दूर रहे।
- जो काम जरुरी है उन्हें पसंद करना सीखे।
- अच्छे ढंग से दिन की शुरुआत करे।
- एक अच्छा खोजी बने।
# आप ऊपर दिए गए कदमो का इस्तेमाल घर,दफ्तर,समाज और धर्म क्षेत्रो में कैसे कर सकते है।
# आप अपनी जिन बातो में बदलाव लाना चाहते है उनकी सूची बनाए।
# हर बदलाव से खुद पर और दूसरो पर पड़ने वाले फायदों की सूची बनाए।
# एक टाइम टेबल बनाए और बदलाव लाने के लिए खुद को कमिट करे।
Giving Respect is not all the way Right
Giving Respect is not all the way Right
नमन नमन में फेर हैं !
अनुतीर्ण हुआ लड़का नम्र हो तो उसमे खाश आश्चर्य नहीं, प्रशंस्नीय तो है , प्रथम नंबर से पास हुए लडके की नम्रता मे. व्यक्ति सब जगह ,हर किसी के सामने झुकता जाए इतना लाचार नहीं होना चाहिये. वही किसी के भी सामने ना नमे, इतना उन्मंत या घमंडी भी नहीं होना चाहिये।
नमन नमन में फेर है , बहुत नमे नादान।
दगलबाज दौहरा नमे , चित्ता चोर कमान।
कही भी ना नमने वाला जैसे गर्विष्ठ बन जाता है ,वैसे ही हर जगह नमते रहने वाला गौरवहीन बन जाता है. गर्व रखना नहीं चाहिए और गौरव गुमाना नहीं चाहिये. तेजस्विता और उन्मत्तता , वैसे ही नम्रत्ता और लाचारी के बीच की भेद रेखा को परख सके , उतना विवेक तो इंसान को रहना ही चाहिए।
O My God
Prayer to God
हे ह्रदय स्वामी !तु ही मेरे जीवन का आचार्य बन।
मेरे विकास के लिए जो कडवा -मीठा अनुभव कराना हो वह जरुर करा।
मै यह नहीं माँगता की मेरी जीवन साधना सरल हो।
जैसे सख्त गर्मी और सख्त ठंडी से वृक्ष की शक्ति बढती है ,
और छोटे -छोटे पेड़ो में प्राण शक्ति का विकास होता है,
वैसे ही सुख -दुःख ,लाभ -हानी और जय -पराजय से,
हमारा जीवन गंभीर,समर्थ और समर्द्ध ही होगा,हमारी संस्कार समता बढ़ेगी ही।
हम कभी नहीं मांगेगे की हमारी शिक्षा सुखमय हो।
हमारे जीवन के चाहे जितने टुकडे हो जाए .
हमारा ह्रदय अटूट रहे ,इसके टुकडे ना हो ! मेरे भगवान्
हमारी निष्ठा में कभी दुविधा ना आ जाए ,
बुद्धि एक बात और ह्रदय दूसरी बात कहे,ऐसी हमारी विडम्बना ना हो।
अगर हमारा ह्रदय अटूट रहेगा तो हमें किसी भी वस्तु की परवाह नहीं।
भगवान् !हमें अविच्छिन ह्रदय का वरदान दो और फीर
हमारे पास से जो चाहे काम लो ,और चाहे जिस हालात में रखो
हमें मंजूर है।
Labels:
personality,
Prayer
Location:india
Mumbai, Maharashtra, India
.Teacher Is A Best Manufacturer ?
Teacher Is A Best Manufacturer ?
वो कहते है की,जो कर सकते है, वो करते है।
जो कुछ नहीं कर सकते , वो शिक्षक बनते है !
वो लोग पुछते है ...
बोलो, शिक्षक क्या बनाता है ?
सच में जानना है की-
मै एक शिक्षक
क्या करता हूँ ? क्या बनाता हूँ ?
मै बालको के पास से,
वह मेहनत लेता हूँ,
की जो उनकी ताकत होने के बावजुद
वे कर सकते है ऐसा भरोसा नहीं होता .
मै सी - ग्रेड को गोल्ड मेडल दिला सकता हूँ ,
और ए -ग्रेड को
गाल पर तमाशा पड़े ऐसे ,
उसकी असली मर्यादा का तम-तमाता
एहसास!
अगर आप बेस्ट ना बनना चाहते हो ,
तो मेरा समय बर्बाद नहीं कर सकते .
मै विधार्थी को घंटो तक
एक जगह बिठाए रख सकता हूँ .
मै विधार्थी के अभिभावकों को फ़ोन करके ,
उन्हें उनके बच्चे कैसे है,
और क्या कर सकते है
उसकी पहचान करवाता हूँ .
आपको अभी भी जानना है की
मै (व्यापारी की अपेक्षा से)क्या बनाता हूँ ?
मै जीने जैसा इंसान बनाता हूँ .
मै विधार्थीओ को अद्धभुतता (आश्चर्य )सिखाता हूँ .
उन्हें सवाल पुछना सिखाता हूँ .
उन्हें भुल हो वहां -
सच्चे दिल से माफ़ी मांगना सिखाता हूँ .
मै उन्हें लिखने ,बोलने
और ज्यादा से ज्यादा पढ़ने की आदत सिखाता हूँ .
मै टकोर करता हुं उनकी भाषा,
और उनकी गणित में .
मै उन्हें समझाता हूँ की ,
अगर तुम्हारे पास प्रतिभा हो,
तो पुरुषार्थ की इतनी चिढीया चढो .
और दुनिया के निर्णय (जजमेंट) का
जिंदगी से जवाब दो .
मै एक शिक्षक हूँ .
अपने प्रयत्नों से दुनिया में परिवर्तन लाता हूँ .
मगर , आप क्या करते है ?
Anger + Foolishness = Disaster
![]() |
| डॉ .माया कोदनानी |
आवेश,अहंकार क्रोध, विवेक शुन्यता ,और नफरत की परिणीती के उदाहरण है, डॉ. माया कोडनानी ,बाबू बजरंगी और अन्य लोग , जिन्हें विशेष कोर्ट ने 2002 के नरोदा - पाटिया केस में आजीवन सजा सुनाई ।
पेशे से शायद ही ,इनमे से कोई गुनाहीत प्रवर्ती का होगा . 27/28 फरवरी 2002 के पहले शायद ही इनमे से (और दुसरे भी जो ,हिंसक बने थे पर पकडे नहीं गए ) कोई इतना हिंसक होने के बारे में सपने में भी सोचता होगा। मगर कुछ सिरफिरों को जवाब देने के जुनून ने , इनकी विवेकता को ख़त्म कर दीया .
डॉ . माया जो एक नेता होने के पहले, एक गाय्नोक्लोजी और महिला थी , कितने ही जीवो को इस दुनिया में आने में सहायक बनी होगी . मगर उनकी नफरत, आक्रोश और विवेकशुन्यता ने कितने ही इंसानों के क़त्ल में सहायक बनी .
कई घटनाएं हमे बहुत कुछ सिखा जाती है . विवेक शुन्यता ,एक आम आदमी को कैसे हिंसक और कातिल बना देती है . और भूल जाते है की इसका परिणाम कभी अच्छा नहीं होगा।
How to Stop Dispute on Disagreement
असहमती (Disagreement) को ज्यादा विवाद (Dispute) में बढ़ने से रोकने के ७ उपाय
कभी ऐसा होता है की आपकी आक्रमकता देख कर सामने वाले की बोलती बंद हो जाए . मगर यह आपकी जीत नहीं हार है.
अपनी असहमती को व्यर्थ चर्चा की तरफ मोड़ने से रोकना ,यह भी समयोचित जानकारी (काबिलीयत) का विषय है.
यहाँ पर असहमती को विवाद में बदलने से कैसे रोका जाए ,उसके कुछ सुचन दिए गए है.-
(१) असहमती का स्वागत करो
(२) अपनी पहली प्रतिक्तिया पर भरोशा ना रखे
(३) गुस्से पर नियंत्रण रखे
(४) विरोध करने वालो की बातो को संपूर्ण रूप से चुने
(५) प्रत्युतर देने में प्रामाणिकता रखे
(६) ऐसे वादे करे की विरोधियो के सुचन पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाएगा (७)दोनों बातो का विचार करके ही कार्य करे
(१) असहमती का स्वागत करो -: चर्चा के दरम्यान किसी नए मुद्दे की तरफ आपका ध्यान दिलाया जाए, जिसके बारे में आपने कभी विचार ही नहीं किया हो तो उसका आभार सहीत स्वीकार करना चाहिए .शायद ऐसा भी हो सकता है की ऐसे सुचन से आप गंभीर भूल करने से अटक जाए और भूल को पहले ही सुधार ले.
(२) अपनी पहली प्रतिक्तिया पर भरोशा ना रखे -: जब भी हमारे सामने मुश्किल परिस्थति उपस्थ्ति होती है तब हम उसके बारे में स्वस्थता से सोचने के बदले सुरक्शात्मक्ता को ज्यादा महत्व देते है. ऐसे संजोगो में भावुक होने के बदले ठंडे दिमाग से विचार कर मन में चलते विचारों की आंधी पर नियंत्रण रखना ज्यादा श्रेस्कर होगा. हमारी प्रथम प्रतिक्रिया श्रेष्ट होने के बदले नुकसान कारक भी हो सकती है.
(३) गुस्से पर नियंत्रण रखे -: मनुष्य का कद उसकी क्रोध नियंत्रण की समता द्वारा मापा जा सकता है. मनुष्य कोनसी व् कैसी बातो पर गुस्सा होता है उसके द्वारा ही उसका मूल्यांकन होता है.
(४) विरोध करने वालो की बातो को संपूर्ण रूप से सुने -: हमारे विरोधियो को बोलने का पर्याप्त मौका देना यह हमारे ही हित में है. उन्हें अपनी बात पूरी तरह से कहने दी जाए, बीच में विरोध ना करे या अपने बचाव में बीच में ना कूद पड़े . ऐसा करने एक दीवार खड़ी होती है . विरोधियो की बाते सुन कर हमे ऐसे बिंदु से प्रत्युतर का आरम्भ करना चाहिए ,जिसमे हम अपने विरोधी के साथ सहमत हो.
(५) प्रत्युतर देने में प्रामाणिकता रखे -: प्रत्युतर देने में ऐसे बिंदु का भी ध्यान रखना चाहिए ,जिसमे हम अपनी भूल मानते हो तो उसका स्वीकार करे . ऐसे करने से विरोधी ठंडे पड़ जायेंगे .
(६) ऐसे वादे करे की विरोधियो के सुचन पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाएगा -: चर्चा दरम्यान ऐसा भी हो सकता है की हमारे विरोधी सही हो , अगर जो हम उनके सुचनो पर गंभीरता से सोचना बंद कर देंगे तो विरोधियो की सही बात पर अमल करने का मौका भी गवा देंगे . और विरोधी ज्यादा आक्रामक बन कर , पीछे से ऐसा कहने का मौका जाने नहीं देंगे की हमने तो आपको समझाने की काफी कोशिश की थी ,मगर आपने हमारी बात बिल्कुल अनचुनी कर दी थी. प्रश्न में रस लेने के बदले विरोधियो का आभार मानने से आधी जीत तो अपने आप ही सिद्ध हो जाती है.
(७)दोनों बातो का विचार करके ही कार्य करे -: सब बातो का सकारत्मक - नकारत्मक तरफ का विचार करने के बाद ही सामने वाले पक्ष को फिर से मिलने के लीये बैठक का आयोजन किया जा सकता है.
सफल संवाद का कौशल्य यह भी एक बड़ी सिद्धी है !
What we talk, They not carry same .
हम क्या बोलते है, और क्या पहुंचता है!
. अक्सर हम समझते है की हम जो बाते कहते है सामने वाला भी वैसे ही समझता है. मगर कई बार ऐसा नहीं होता . हम अपने आत्म विश्वास (Self Confident ),नए विचारों के द्वारा अपनी बात सबके साथ करते है. मगर सामने वाले की समझ , उसके ज्ञान , और उसकी नियत पर आधार रखता है की वह हमारी बातो को किस प्रकार से समझता है और उसका क्या मतलब निकालता है.
अपनी सोच के दायरे के अनुचार वह हमारी बात करने के तरीके का , हमारे खुल्ले पण का मतलब निकाल लेता है. हम जो वाद ( Debate ) किसीके साथ करते है, वह सामने वाला अपने अनुचार सुनता है, समझता है और कभी कभी बुरे तरीके से दूसरो के साथ बांटता भी है. इससे ऐसे आधे अधूरे सोच -समझ वाले व्यक्तियों के साथ नुकशान हमारा ही है.
यह हमारी जवाबदारी (Responsibility) बन जाती है, की हम लोगो को देखकर , उसकी समझ व् नियत को जान कर उससे बाते करे . किससे कितनी गहरी बाते करनी चाहिए यह हमे समझना होगा.हमारा मन साफ़ होने से कुछ नहीं होता। सामने वाले का मन और समझ साफ़ होनी चाहिए. अगर सामने वाले का मन, समझ साफ़ होगी तो अगर हमसे कोई गलती हो भी जाए तो वह उसे सुधार लेगा.मगर हम लोगो को कितना समझते , जानते है ,यह बड़ा प्रश्न है
इसलिए यह जरुरी है की किस माहोल में,कैसे लोगो के साथ कितना खुलना है , यह निर्णय काफी सोच-समज के साथ लेना होगा. हमे यह भी ध्यान रखना होगा की हम अपनी गोपनीय बातो को, दूसरो के साथ अपने संबंधो को , अपनी सफ़र की जानकारी वगैरे को कैसे लोगो के साथ बाँट रहे है.
अक्सर आधा सच , झूठ के बराबर होता है.लोग उसे अपने अपने नजरिये अनुचार समझते है और अर्थ का अनर्थ हो जाता है.और हम भी या कोई भी ज्यादातर बाते करते समय पूरी व्याख्या नहीं करते,की बात किस सन्दर्भ में हो रही है.
हमारा स्वभाव है,की अक्सर हम किसी की बातो का गलत मतलब ही निकालते है. क्योकि हम बातो को समज कर उसका मतलब नहीं निकालते , बल्कि हम व्यक्ति को देखकर , उसके हाव भाव देख कर, उसके साथ हमारे संबंधो को देखकर, उसकी इमेज के अनुचार ही उसकी बातो का मतलब निकाल लेते है. अगर हमारे बिच में कोई किसी की बातो को सकारात्मक तरीके से समझने/ समझाने की कोशिश करता है तो भी उसे नकार देते है या उससे सहमत नहीं होते, क्योकि हमारे आस पास का माहोल ही ऐसा होता है , जो हमे गलत नजरिये से देखने को प्रेरित करता है.
अक्सर हम सोचते है की हम दोस्तों में, या अन्य लोगो में बहुत कुछ बोल कर अपनी छाप छोड़ देंगे .मगर ऐसा होता नहीं है.हम नपे - तुले व् कम शब्दों में और खाश अपने आचरण के द्वारा अपनी इमेज बना सकते है.
अक्सर हम कई अलग-अलग जगहों में अलग-२ लोगो के समूह में साथ रहते है.ऐसे अवसरों में भी हमे अपनी बोल चाल,आचरण द्वारा अपनी इमेज की परवाह करनी चाहिए.
एक बार फिर की, हम जैसा सोचते है,जो कहना चाहते है,जो कहते है, वैसा ही सामने वाला समझेगा यह जरूरी नहीं है. हमारी इमेज,रिश्ते व् सामने वाले की नियत भी साथ में बोलती है.ऐसा नहीं है की सामने वाला ही गलत करता है, हम भी वैसा ही करते है. तो क्यों ना औरो की बात को सकारात्मक तरीके से सोचने/ समझने की शुरुआत हम खुद से करे !
Who Is Educated ?
वे ही सर्व सच्चे अर्थो में शिक्षित है!
पहले, वे जो रोजाना आने वाले हालात का सामना सही ढंग से करते है, और वे जो हालात से सामना होने पर सही निर्णय लेने और सही कदम उठाने में शायद ही कभी चुकते हो!
दुसरे वे जो दूसरो के साथ व्यवहार में बडप्पन दिखाते है , दुसरो के अप्रिय व्यवहार और बातो का बुरा नहीं मानते और अपने सहयोगियों के साथ उतने भले होते है ,जितना की एक इंसान हो सकता है!
और आगे , वे जो अपनी खुशियों पर काबू रखते है,और कठिनाइयो को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते ,और कठीन परिस्थितियों का मुकाबला एक बहादुर इंसान की तरह करते है जो इंसानी फितरत है!
और सबसे बड़ी बात यह है की वे लोग जो सफलता मिलने पर बिगड़ते नहीं,जो अपनी असलीयत से मुहँ नहीं मोड़ते, साथ ही बुद्धिमान और धीर - गंभीर व्यक्ति की तरह मजबूती (द्रढता ) से जमीन पर पैर जमाये रखते है, तुक्के से मिली अच्छी चीजों पर खुश होने के बजाये, जन्म से मिली काबलियत, और बुध्धि से प्राप्त कामयाबियो पर खुश होते है . खुश होने की ऐसी प्रवर्ति उनकी बचपन से ही होती है!
जिन लोगो के चरित्र में इनमे से एक - दो नहीं,बल्कि सारे गुण है, जिन्होंने ये सभी बाते सीखी है -वे ही सर्व गुण सम्पन्न सच्चे अर्थो में शिक्षित है!
सुकरात (ईस्वी पूर्व ४७० से ३९९) द्वारा कही गयी लगभग २५०० वर्ष पहले की ये बाते आज भी उतनी ही मायने रखती है या शायद ज्यादा .........!
हमारे पास अधिक बुद्धि और अल्प सम्पति है..
हमारी मान्यता है की हमारे पास -अधिक बुद्धि है।
और
हमारी मान्यता है की हमारे पास -अल्प सम्पति है।
अधिक बुद्धि की मान्यता ने हमें - नम्र बनते रोका ।
अधिक बुद्धि की मान्यता ने हमें - समर्पण करते रोका।
अधिक बुद्धि की मान्यता ने हमें - विनयी बनते रोका।
अधिक बुद्धि की मान्यता ने हमें - सरल बनते रोका।
अल्प सम्पति की मान्यता ने हमें- संतोषी बनते रोका ।
अल्प सम्पति की मान्यता ने हमें- नीतिमान बनते रोका।
अल्प सम्पति की मान्यता ने हमें- सन्वेदनशील बनते रोका।
अल्प सम्पति की मान्यता ने हमें- उदार दील बनते रोका।
और
हमारी मान्यता है की हमारे पास -अल्प सम्पति है।
अधिक बुद्धि की मान्यता ने हमें - नम्र बनते रोका ।
अधिक बुद्धि की मान्यता ने हमें - समर्पण करते रोका।
अधिक बुद्धि की मान्यता ने हमें - विनयी बनते रोका।
अधिक बुद्धि की मान्यता ने हमें - सरल बनते रोका।
अल्प सम्पति की मान्यता ने हमें- संतोषी बनते रोका ।
अल्प सम्पति की मान्यता ने हमें- नीतिमान बनते रोका।
अल्प सम्पति की मान्यता ने हमें- सन्वेदनशील बनते रोका।
अल्प सम्पति की मान्यता ने हमें- उदार दील बनते रोका।
9 Way to Mature Your Intelligence ( Hindi)
बुद्धि (Intelligence) नौ (9 ) प्रकार से परिपक्व (Mature)बनती है।
1) उम्र के बढ़ने से ।
2) यश के विस्तार से ।
3) बार -बार प्रश्न पूछने से।
4) गुरु के साथ रहने से।
5) गंभीरता पूर्वक विचार करने से।
6) अच्छे लोगो के साथ विचारना करने से ।
7) मन में प्रेम भाव की अभिवृद्धि (बढाने ) करने से।
8) अनुकूल स्थान में निवास करने से।
9) किताबे पढने से।
बच्चे वही सीखते है, जो जीते है.
अगर बच्चा प्रशंसा के माहोल में रहता है तो तारीफ़ करना सीखता है।
अगर बच्चा लड़ने के माहोल में रहता है तो झगड़ना सीखता है।
अगर बच्चा सहनशीलता के माहोल में रहता है तो धैर्य सीखता है।
अगर बच्चा बेहूदे और खिल्ली उड़ाने वाले माहोल में रहता है संकोच करना सीखता है।
अगर बच्चा प्रोत्साहन के माहोल में रहता है तो आत्म विस्वास सीखता है।
अगर बच्चा शर्मिंदगी के माहोल में रहता है तो खुद को दोषी मानना सीखता है।
अगर बच्चा समर्थन के माहोल में रहता है तो खुद को पसंद करना सीखता है।
अगर बच्चा न्याय संगत माहोल में रहता है तो इन्साफ करना सीखता है।
अगर बच्चा सुरक्षा के माहोल में रहता है तो भरोसा करना सीखता है।
अगर बच्चा सहमती और दोस्ती के माहोल में रहता है तो दुनिया में प्यार ढूंढना सीखता है।
संकलित कविता
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