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My Dear Daughter !( Hindi)

                                                बेटी चली ससुराल !


प्रिय बेटी जीनल ,                                                            08 /02/15

अपने इस घर में तुम सुरक्षित ,निश्चिंत और आजादी का जीवन बिता रही थी । आज तुम अपना नया आशियाना बसाने जा रही हो। इस अवसर पर हम तुमसे कुछ ख़ास बाते बताना चाहते  है, अपने माता -पिता की ये बाते ध्यान से सुनना और समझना । 

6 Emotional Requirement of Husband & Wife (in Hindi)

 

            पति और पत्नी की ६ भावनात्मक जरूरते !

विज्ञान कहता है की पुरुष और स्त्री की भावनात्मक जरूरते अलग होती है. यह समस्या तब और जटील हो जाती है ,जब पता चले की दोनों प्राय: इस वैज्ञानिक तथ्य से अनभिज्ञ  (अनजान )रहते है. परिणाम यह होता है की , आपसी तनाव के समय भी वे यह नहीं जान पाते की , कैसे एक दुसरे की सहायता कर ,इस मुश्किल से बाहर निकले. ऐसे में पति -पत्नी के बीच आपसी अविश्वाश की खाई और चौड़ी हो जाती है.   

पति और पत्नी की मुख्य रुप से  ६ भावनात्मक जरूरते:-

पुरुष को इन ६ की अधिक जरुरत होती है। 

(1 )विश्वाश (TRUST )
(२) स्वीकार्यता (ACCEPTANCE )
(3) प्रशंसा (ADMIRATION )
(4 )सराहना  (APPRECIATION )
(5 )प्रोत्साहन (ENCOURAGEMENT )
(6 )अनुमोदन (APPROVAL ) 

स्त्री को इन ६ की अधिक जरुरत होती है।

(1)समर्पण (DEVOTION )
(2) देखरेख (CARRYING)
(3 ) आपसी समझ ( UNDERSTANDING )
(4 )सम्मान ( RESPECT )
(5 ) मान्यता (VALIDATION )
(6 ) आश्वासन ( ASSURANCE )

Father to a Son

                   

  1. विचार बड़े बड़े करना , मगर छोटी छोटी खुशियों को भी मानते रहना। 
  2. व्यक्ति घिस जाए उसकी परवाह नहीं, मगर व्यक्ति मिट ना जाए वह महत्व का है। 
  3. अच्छी अच्छी पुस्तको को सहेज कर रखना ,फिर चाहे ऐसा क्यों न लगे की ये पढ़ी नहीं जायेगी। 
  4. किसी के भी प्रति आशा खोना मत , क्योंकि चमत्कार रोज होते रहते है। 
  5. हर बात में उत्तमता का आग्रह रखना और उसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना। 
  6. तंदुरस्ती अपने आप ठीक रहेगी , ऐसा कभी मत समझना। 
  7. अपनी नजर के सामने हमेशा कुछ सुन्दर रखना , फिर भले ही वह एक प्याले में रखा फूल ही हो। 
  8. मुझसे यह काम थोडा सा ही होगा ऐसा लगे ,इसलिए उस काम को नहीं करना ऐसा मत मानना ,जो थोडा भी तुमसे होता है वह जरुर करना। 
  9. सम्पूर्णता के लिए नहीं , श्रेष्ठता के लिए कोशिश करना। 
  10. जो तुच्छ है उसे पहचानना सीखे ,फिर उसकी अवगणना करे। 
  11. घिस जाना मगर मिट मत जाना , अपने आप को निरंतर सुधारते रहने की प्रतिज्ञा करना। 
  12. हार में खेलदिली ,जीत में खेलदिली बताना , प्रशंसा सबके सामने करना ,टीका अकेले में करना। 
  13. तेरे परिवार को तू कितना चाहता है उसे रोज तेरे शब्दों द्वारा ,स्पर्श द्वारा ,तेरी विचार शीलता द्वारा बताते रहना। 
  14. अपने आप में परिवर्तन लाने की अपनी शक्ति का अंदाजा कभी कम मत लगाना. मगर दूसरो में परिवर्तन लाने की अपनी शक्ति का अंदाजा बहुत ज्यादा मत मानना। 
  15. कब चुप रहना उसका ख्याल रखना और और कब चुप नहीं रहना उसका भी ख्याल रखना। 
  16. गन्दगी के सामने हमेशा युद्धरत रहना। 
  17. दुसरो की सफलता में उत्साह बताना और दुसरे लोगो को उनको खुद का महत्व पता चले ऐसे मौके ढूंढ़ते रहना। 
  18. अपने निर्वाह के लिए मेहनत करते हर व्यक्ति के साथ सम्मान से पेश आना ,फिर चाहे भले वह कार्य छोटा ही क्यों ना हो। 
  19. इस प्रकार जीवन जीना की तुम्हारे बालक जब भी इमानदारी ,निष्ठा और प्रामाणिकता का विचार करे तब उन्हें तुम याद  आओ। 
  20. जिन्हें उस बात की कभी खबर भी ना लगे ऐसा हो ,ऐसे लोगो के लिए कुछ अच्छा करते रहने की आदत डालना। 
  21. गुलाबो की सुगंध ले सको , इतनी फुरसत रखना। 
  22. दिमाग मजबुत रखना , दिल नरम रखना। 
  23. कौन सही है ,उसे जानने में वक्त कम लगाना और क्या सही है उसे जानने में ज्यादा। 
  24. जो गाँठ छुट सकती है उसे कभी मत काटना। 
  25. बड़े युद्ध जितने के लिए छोटी छोटी लड़ाईयाँ हारना सीखना। 
  26. हर चीज जिस हालत में हमे मिली है , उससे अच्छी हालत में उसे रखना सीखे। 
  27. सफल लग्न जीवन का आधार दो बातो पर निर्भर है.  योग्य पात्र ढूंढना और योग्य पात्र बनना। 
  28. समय नहीं मिलता ऐसा मत कहना क्योंकि एक दिन में तुम्हे भी उतने ही घंटे मिलते है जितने मदर टेरेसा , जे आर डी टाटा ,आइन्सताईना ,महात्मा गाँधी आदि को। 
  29. सुख का आधार संपति ,सत्ता या शौर्य  पर नहीं , मगर जिन्हें हम चाहते और सम्मान करते है उन लोगो के साथ अपने संबंधो पर है। 
  30. तुम्हे मान मिले उसमे दूसरो को भी सहभागी बनाना। 
  31. अपने बच्चो को नियमित कुछ पढ़ कर सुनाना , गीत सुनाना और हमेशा उन्हें सुनना। 
  32. "मुझे इसकी खबर नहीं" ऐसा कहते डरना मत, "मुझसे भूल हो गई" ऐसा कहते हिचकिचाना मत,"मै शर्मिंदा हूँ " ऐसा कहते डगमगाना मत। 
  33. कभी कभी असफल होने की तैयारी रखना।  

How to Stop Dispute on Disagreement




  असहमती (Disagreement) को ज्यादा विवाद (Dispute)  में बढ़ने से रोकने के ७ उपाय 
  कभी ऐसा होता है की आपकी आक्रमकता देख कर सामने वाले की बोलती बंद हो जाए . मगर यह आपकी जीत नहीं हार है.
अपनी  असहमती को व्यर्थ चर्चा की तरफ मोड़ने से रोकना ,यह भी समयोचित जानकारी (काबिलीयत) का विषय है.
यहाँ पर असहमती को विवाद में बदलने से कैसे रोका जाए ,उसके कुछ सुचन दिए गए है.-
(१) असहमती का स्वागत करो        
(२) अपनी पहली प्रतिक्तिया पर भरोशा ना रखे   
(३) गुस्से पर नियंत्रण रखे                           
(४) विरोध करने वालो की बातो को संपूर्ण रूप से चुने  
(५) प्रत्युतर देने में प्रामाणिकता रखे          
(६) ऐसे वादे करे की विरोधियो के सुचन पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाएगा                    (७)दोनों बातो का विचार करके ही कार्य करे 

(१) असहमती का स्वागत करो -: चर्चा के दरम्यान किसी नए मुद्दे की तरफ आपका ध्यान दिलाया जाए, जिसके बारे में आपने कभी विचार ही नहीं किया हो तो उसका आभार सहीत स्वीकार करना चाहिए .शायद ऐसा भी हो सकता है की ऐसे सुचन से आप गंभीर भूल करने से अटक जाए और भूल को पहले ही सुधार ले.
(२) अपनी पहली प्रतिक्तिया पर भरोशा ना रखे -: जब भी हमारे सामने मुश्किल परिस्थति उपस्थ्ति होती है तब हम उसके बारे में स्वस्थता से सोचने के बदले सुरक्शात्मक्ता को ज्यादा महत्व देते है. ऐसे संजोगो में भावुक होने के बदले ठंडे दिमाग से विचार कर मन में चलते विचारों की आंधी पर नियंत्रण रखना ज्यादा श्रेस्कर होगा. हमारी  प्रथम प्रतिक्रिया श्रेष्ट होने के बदले नुकसान कारक भी हो सकती है.
(३) गुस्से पर नियंत्रण रखे -: मनुष्य का कद उसकी क्रोध नियंत्रण की समता द्वारा मापा जा सकता है. मनुष्य कोनसी  व् कैसी बातो पर गुस्सा होता है उसके द्वारा ही उसका मूल्यांकन होता है.
(४) विरोध करने वालो की बातो को संपूर्ण रूप से सुने -: हमारे विरोधियो को बोलने का पर्याप्त मौका देना यह हमारे ही हित में है. उन्हें अपनी बात पूरी तरह से कहने दी जाए, बीच में विरोध ना करे या  अपने बचाव में बीच में ना कूद पड़े . ऐसा करने एक दीवार खड़ी होती है . विरोधियो की बाते सुन कर हमे ऐसे बिंदु से प्रत्युतर का आरम्भ करना चाहिए ,जिसमे हम अपने  विरोधी के साथ सहमत हो.
 (५) प्रत्युतर देने में प्रामाणिकता रखे -: प्रत्युतर देने में ऐसे बिंदु का भी ध्यान रखना चाहिए ,जिसमे हम अपनी भूल मानते हो तो उसका स्वीकार करे . ऐसे करने से विरोधी ठंडे पड़ जायेंगे .
 (६) ऐसे वादे करे की विरोधियो के सुचन पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाएगा -: चर्चा दरम्यान ऐसा भी हो सकता है की हमारे विरोधी सही हो , अगर जो हम उनके सुचनो पर गंभीरता से सोचना बंद कर देंगे तो विरोधियो की सही बात पर अमल करने का मौका भी गवा देंगे . और विरोधी ज्यादा आक्रामक बन कर , पीछे से ऐसा कहने का मौका जाने नहीं देंगे की हमने तो आपको समझाने की काफी कोशिश की थी ,मगर आपने हमारी बात बिल्कुल अनचुनी कर दी थी. प्रश्न में रस लेने के बदले विरोधियो का आभार मानने से आधी जीत तो अपने आप ही सिद्ध हो जाती है.
(७)दोनों बातो का विचार करके ही कार्य करे -: सब बातो का सकारत्मक - नकारत्मक तरफ का विचार करने के बाद ही सामने वाले पक्ष को फिर से मिलने के लीये बैठक का आयोजन किया जा सकता है.
       सफल संवाद का कौशल्य यह भी एक बड़ी सिद्धी है !



What we talk, They not carry same .

                                 हम क्या बोलते है, और क्या पहुंचता है!  


                                   .            अक्सर हम समझते है की हम जो बाते कहते है सामने वाला भी वैसे ही समझता है. मगर कई बार ऐसा नहीं होता . हम अपने आत्म विश्वास (Self  Confident ),नए विचारों के द्वारा अपनी बात सबके साथ करते है. मगर सामने वाले की समझ , उसके ज्ञान , और उसकी नियत पर आधार रखता है की वह हमारी बातो को किस प्रकार  से समझता है और उसका क्या मतलब निकालता है. 

अपनी सोच के दायरे के अनुचार वह हमारी बात करने के तरीके का , हमारे खुल्ले पण का मतलब निकाल लेता है.  हम जो वाद ( Debate ) किसीके साथ करते है, वह सामने वाला अपने अनुचार सुनता है, समझता है और कभी कभी बुरे तरीके से दूसरो के साथ बांटता भी है. इससे ऐसे आधे अधूरे सोच -समझ वाले व्यक्तियों के साथ नुकशान हमारा ही है.

 यह हमारी जवाबदारी (Responsibility)  बन जाती है, की हम लोगो को देखकर , उसकी समझ व् नियत को जान कर उससे बाते करे . किससे कितनी गहरी बाते करनी चाहिए यह हमे समझना होगा.हमारा मन साफ़ होने से कुछ नहीं होता। सामने वाले का मन  और समझ साफ़ होनी चाहिए. अगर सामने वाले का मन, समझ साफ़ होगी तो अगर हमसे कोई गलती हो भी जाए तो वह उसे सुधार लेगा.मगर हम लोगो को कितना समझते , जानते है ,यह बड़ा प्रश्न है                                            

इसलिए यह जरुरी है की किस माहोल में,कैसे लोगो के साथ कितना खुलना है , यह निर्णय काफी सोच-समज के साथ लेना होगा. हमे  यह भी ध्यान रखना होगा की हम अपनी गोपनीय बातो को, दूसरो के साथ अपने संबंधो को , अपनी सफ़र की जानकारी वगैरे को कैसे लोगो के साथ बाँट रहे है.
 

अक्सर आधा सच , झूठ के बराबर होता है.लोग उसे अपने अपने नजरिये अनुचार समझते है और अर्थ का अनर्थ हो जाता है.और हम भी या कोई भी ज्यादातर बाते करते समय पूरी व्याख्या नहीं करते,की बात किस सन्दर्भ में हो रही है.         

 हमारा स्वभाव है,की अक्सर हम किसी की बातो का गलत मतलब ही निकालते है. क्योकि हम बातो को समज कर उसका मतलब नहीं निकालते , बल्कि हम व्यक्ति को देखकर , उसके हाव भाव देख कर,  उसके साथ हमारे संबंधो को देखकर, उसकी इमेज के अनुचार ही उसकी बातो का मतलब निकाल लेते है. अगर हमारे बिच में कोई किसी की बातो को सकारात्मक तरीके से समझने/ समझाने  की कोशिश करता है तो भी उसे नकार देते है या उससे सहमत नहीं होते, क्योकि हमारे आस पास का माहोल ही ऐसा होता है , जो हमे गलत नजरिये से देखने को प्रेरित करता है.

 अक्सर हम सोचते है की हम दोस्तों में, या अन्य लोगो में बहुत कुछ बोल कर अपनी छाप छोड़ देंगे .मगर ऐसा होता नहीं है.हम नपे - तुले व् कम शब्दों में और खाश अपने आचरण के द्वारा अपनी इमेज बना सकते है.

अक्सर हम कई अलग-अलग जगहों में अलग-२ लोगो के समूह में साथ रहते है.ऐसे अवसरों में भी हमे अपनी बोल चाल,आचरण द्वारा अपनी इमेज की परवाह करनी चाहिए.
 

एक बार फिर की, हम जैसा सोचते है,जो कहना चाहते है,जो कहते है, वैसा ही सामने वाला समझेगा यह जरूरी नहीं है. हमारी इमेज,रिश्ते व् सामने वाले की नियत भी साथ में बोलती है.ऐसा नहीं है की सामने वाला ही गलत करता है, हम भी वैसा ही करते है. तो क्यों ना औरो की बात को सकारात्मक तरीके से सोचने/ समझने की शुरुआत हम खुद से करे !

FRIENDS FOR EVER

F  =  FAITHFUL
R  =  REAL
I   =  INTEREST
E  =  ENCOURAGE
N  =  NOBLE 
D  =  DUTY

FRIENDS ( NOT) FOR EVER !

आप खुश होंगे तो , लोग आप के पास आयेंगे . 
आप दुखी होंगे तो ,वे  आँखे चुरायेंगे .
वे आपकी सारी खुशिया बांटना चाहते है.
मगर  आपके  दुःख में हिस्सेदारी नहीं चाहते .
अगर आप खुश है तो , आप के बहुत सारे दोस्त होंगे .
आपके दुखी होने पर वे आप से किनारा कर लेंगे .
आपके मधुरतम पैग को कोई नहीं नकारेगा ,
मगर जिंदगी के कडवे घूंट आपको अकेले ही पीने पड़ेंगे !

मान -सम्मान की रक्षा . .



अगर आप खुद के मान सम्मान  को महत्व देते है तो  गुणवान और अच्छे चरित्र वाले लोगो की संगत में रहो क्योंकि गलत और हल्के चरित्र वाले लोगो के साथ रहने से तो अच्छा है आप अकेले ही रहो।
अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति अगर आप का दुश्मन होगा तो भी वह आप के मान सम्मान का ख्याल रखेगा । मगर गलत व हल्के चरित्र वाला आप का जिगरी यार होगा  आप का भ्रम तो भी कभी भी आप के मान सम्मान को ठेस पहुंचा सकता है

पूत कपूत तो क्यों धन संचे,पूत सपूत तो क्यों धन संचे

जिस स्थितीमें इंसान आ जाता है, उस स्थिती को मानने की तैयारी हो तो दुःख और पीड़ा की ज्यादातर वेदना चली जाती है। सुख और दुःख से निर्लेप बन कर जो अपनी खुशमिजाजी बनाए रखता है ,आखिर में जीत उसी की होतीहै। इंसान की सुख और दुःख में खुश रहने की मस्त मिजाजी उसे ऐसा सुख प्राप्त करवाता है, जिसे कोई ऑर व्यक्ति या परिस्तिथि उससे छीन नहीं सकती ।
अपनी जरुरत से ज्यादा धन इकठ्ठा करने वाले व्यक्ति के दो गणित मुख्य रहते है। 


१).संचय किया हुआ धन उसे भविष्य की चिंताओं से मुक्त करेगा , २)जब खुद वह इस दुनिया छोड़ कर चला जाएगा तब वह धन उसके पुत्र पुत्रियो के काम आयेगा -।


भविष्य के लिए इंसान कुछ - न-कुछ इंतजाम करे तो इसके इस व्यावारिक बुध्हि का विरोध नहीं किया जा सकता। मगर इंसान का अनुभव तो ऐसा बताता है की भविष्य तो किसी की कल्पना या योजना अनुसार किसी के सामनेनहीं आता है। जब भविष्य , वर्तमान बन सामने आता है , तब एकदम अलग ही परिस्तिथि सामने आती है। जोविचार कर इंतजाम किया हो वो बने ही नहीं ऑर जो नहीं विचारा हो वहीबन जाता है ।


अब दूसरी बात संतानों की करे - मेरे जाने के बाद संचय किया हुआ धन ,मिल्कत आदि मेरे पुत्रो के काम आएगाऐसे सुंदर वहम में इंसान जीता है। अपने संतानों के लिए कुछ छोड़ जाने की भावना पिताको हो वह अच्छी बात है, मगर वह धन संतान को कब कीस प्रसंग में काम ऐसा कोई नहीं जान सकता । संतान वडीलो का त्र्रुण स्वीकारकरेंगे की नहीं , वह बात भी अनुमान बन जाती है। क्योंकि संतानों का उनका अपना जीवन होता है। उनका अलगभविष्य होता है.ऑर जिन्दगी के बारे में उनके स्वतंत्र विचार होते है । एक युवक ने मजाक में कहाँ, . "मेरे पिता ,पुत्र के लिए बहुत सारा धन छोड़ कर जा रहा हूँ , ऐसे ख्याल के साथ गए ,मगर मेरे पिता मेरे लिए जो धन छोड़ कर गए उससे अनेक गुना धन तो मैंने खुद कमाया है.ऑर जो कुछ भी कमाया उसमे मेरे पिताजी के धन का बिल्कुल उपयोग नहीं किया । उन्हें अच्छा लगे या ना लगे ,मगर उनका दिया हुआ एक वारसा मुझे याद रखने जैसा लगता है वह है -डायबीटीस का रोग । " माँ- बाप को लगता है की अपने बालको की जिन्दगी की सब व्यवस्था अपने हाथ सेकर के जाए ,मगर ऐसा सोचा हुआ अक्सर होता नहीं है । उन्हें नहीं मालुम की उनकी संतान उनकी व्यवस्था कोबदल डालेगा । बड़े महल छोड़ कर जाने वाले राजाओं ने कल्पना की होगी की उनके वंशज सुख से रहेंगे ।परिस्तिथि बदल जाने से उनमे कइयो ने महल को होटलों में बदल दिया है ।
माँ - बाप अपने पुत्रो को बहुत कुछ दे सकते है , व देते भी है। शरीर उनका ही दिया हुआ है.प्रेम की एक बड़ी वसीयतदे सकते है। जिन्दगी में आने वाली
समस्याओं को सुलझाने की सूझ -बुझ ऑर सुख दुःख की परिस्तिथि का सामनाकरने की हिम्मत भी वे अपने वसीयत में दे सकते है। रुपये की वसीयत से भी ज्यादा महत्वपूर्ण ऑर कीमती होऐसा बन सकता है ।

पूत सपूत तो क्यों धन संचे ?
पूत कपूत तो क्यों धन संचे ?