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You Start Dying Slowly

नोबेल पुरस्कार विजेता स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता
"You start dying slowly" का हिन्दी अनुवाद......

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं ,
अगर आप करते नहीं कोई यात्रा ,
अगर आप पढ़ते नहीं कोई किताब ,
अगर आप सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ ,
अगर आप करते नहीं किसी की तारीफ़,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं .
जब आप मार डालते हैं अपना स्वाभिमान ,
जब आप नहीं करने देते मदद अपनी,
न करते हैं मदद दूसरों की,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं .
अगर आप बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
अगर आप नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार ,
अगर आप नहीं पहनते हैं अलग अलग रंग,
या आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं .
अगर आप नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को,
और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को ,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें ,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को ,

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं .
अगर आप नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को
जब हों आप असंतुष्ट अपने काम  और परिणाम से,
अगर आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को ,
अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का ,
अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को
अपने जीवन में कम से कम एक बार
किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की ...

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं...

My Dear Daughter !( Hindi)

                                                बेटी चली ससुराल !


प्रिय बेटी जीनल ,                                                            08 /02/15

अपने इस घर में तुम सुरक्षित ,निश्चिंत और आजादी का जीवन बिता रही थी । आज तुम अपना नया आशियाना बसाने जा रही हो। इस अवसर पर हम तुमसे कुछ ख़ास बाते बताना चाहते  है, अपने माता -पिता की ये बाते ध्यान से सुनना और समझना । 

Positive Attitude-Action plan

सकारात्मक नजरिया कायम रखने के लिए "एक्सन प्लान" 

  1. अपनी सोच बदले और अच्छाई खोजे।
  2. हर काम को तुरंत करने की आदत डाले।
  3. अहसानमंद होने का नजरिया बनाए।
  4. लगातार ज्ञान हासिल करने की आदत डाले।
  5. अच्छे स्वाभिमान का निर्माण करे।
  6. बुरे असर से दूर रहे।
  7. जो काम जरुरी है उन्हें पसंद करना सीखे। 
  8. अच्छे ढंग से दिन की शुरुआत करे। 
  9. एक अच्छा खोजी बने।


 # आप ऊपर दिए गए कदमो का इस्तेमाल घर,दफ्तर,समाज और धर्म क्षेत्रो में कैसे कर सकते है।
 # आप अपनी जिन बातो में बदलाव लाना चाहते है उनकी सूची बनाए। 
 # हर बदलाव से खुद पर और दूसरो पर पड़ने वाले फायदों की सूची बनाए।
 # एक टाइम टेबल बनाए और बदलाव लाने के लिए खुद को कमिट करे।

6 Emotional Requirement of Husband & Wife (in Hindi)

 

            पति और पत्नी की ६ भावनात्मक जरूरते !

विज्ञान कहता है की पुरुष और स्त्री की भावनात्मक जरूरते अलग होती है. यह समस्या तब और जटील हो जाती है ,जब पता चले की दोनों प्राय: इस वैज्ञानिक तथ्य से अनभिज्ञ  (अनजान )रहते है. परिणाम यह होता है की , आपसी तनाव के समय भी वे यह नहीं जान पाते की , कैसे एक दुसरे की सहायता कर ,इस मुश्किल से बाहर निकले. ऐसे में पति -पत्नी के बीच आपसी अविश्वाश की खाई और चौड़ी हो जाती है.   

पति और पत्नी की मुख्य रुप से  ६ भावनात्मक जरूरते:-

पुरुष को इन ६ की अधिक जरुरत होती है। 

(1 )विश्वाश (TRUST )
(२) स्वीकार्यता (ACCEPTANCE )
(3) प्रशंसा (ADMIRATION )
(4 )सराहना  (APPRECIATION )
(5 )प्रोत्साहन (ENCOURAGEMENT )
(6 )अनुमोदन (APPROVAL ) 

स्त्री को इन ६ की अधिक जरुरत होती है।

(1)समर्पण (DEVOTION )
(2) देखरेख (CARRYING)
(3 ) आपसी समझ ( UNDERSTANDING )
(4 )सम्मान ( RESPECT )
(5 ) मान्यता (VALIDATION )
(6 ) आश्वासन ( ASSURANCE )

जवाबो की राह कब तक देखेंगे, ये सवाल ?


  • किसी की लगाईं "नफरत की आग "में, हम क्यों जले?
  • किसी की बोई "नफरत की नागफनियो" को ,हम क्यों सिंचे ?
  • किसी के "अहं के पोषण" के लिए, हम क्यों रिस्तो की जड़ो को मिटाये?
  • किसी की "वैचारीक दरिद्रता" को, कैसे हम भी अपनाने की मुर्खता करे?
  • किसी की "गलती की स्पर्धा" ,कैसे हम भी गलती करके करे?
  • किसी के बनाए "गलत रास्तो" पर,क्यों हम चलने को लाचार हो?
  • किसी की "खड़ी की दीवारों" को, क्यों हम बढाने को मजबूर हो?
  • किसी की बनाई "गलत परम्परा" को,क्यों हम आगे बढाने की स्थिती पैदा करे?
  • किसी के "पश्चाताप के अवसर" को, क्यों हम अपने लिए पैदा करे?

  • किसी और की नहीं, "अपनी ही राह" क्यों ना बनाए हम?
  • हमारी बाजुए नहीं,हमारा "विवेक ही हमारी शक्ति" का सूचक क्यों ना हो?
  • अहंकार,क्रोध नहीं , बल्कि "विवेकता,समता,स्नेह"  ही हमारी ताकत क्यों ना हो? 

What we talk, They not carry same .

                                 हम क्या बोलते है, और क्या पहुंचता है!  


                                   .            अक्सर हम समझते है की हम जो बाते कहते है सामने वाला भी वैसे ही समझता है. मगर कई बार ऐसा नहीं होता . हम अपने आत्म विश्वास (Self  Confident ),नए विचारों के द्वारा अपनी बात सबके साथ करते है. मगर सामने वाले की समझ , उसके ज्ञान , और उसकी नियत पर आधार रखता है की वह हमारी बातो को किस प्रकार  से समझता है और उसका क्या मतलब निकालता है. 

अपनी सोच के दायरे के अनुचार वह हमारी बात करने के तरीके का , हमारे खुल्ले पण का मतलब निकाल लेता है.  हम जो वाद ( Debate ) किसीके साथ करते है, वह सामने वाला अपने अनुचार सुनता है, समझता है और कभी कभी बुरे तरीके से दूसरो के साथ बांटता भी है. इससे ऐसे आधे अधूरे सोच -समझ वाले व्यक्तियों के साथ नुकशान हमारा ही है.

 यह हमारी जवाबदारी (Responsibility)  बन जाती है, की हम लोगो को देखकर , उसकी समझ व् नियत को जान कर उससे बाते करे . किससे कितनी गहरी बाते करनी चाहिए यह हमे समझना होगा.हमारा मन साफ़ होने से कुछ नहीं होता। सामने वाले का मन  और समझ साफ़ होनी चाहिए. अगर सामने वाले का मन, समझ साफ़ होगी तो अगर हमसे कोई गलती हो भी जाए तो वह उसे सुधार लेगा.मगर हम लोगो को कितना समझते , जानते है ,यह बड़ा प्रश्न है                                            

इसलिए यह जरुरी है की किस माहोल में,कैसे लोगो के साथ कितना खुलना है , यह निर्णय काफी सोच-समज के साथ लेना होगा. हमे  यह भी ध्यान रखना होगा की हम अपनी गोपनीय बातो को, दूसरो के साथ अपने संबंधो को , अपनी सफ़र की जानकारी वगैरे को कैसे लोगो के साथ बाँट रहे है.
 

अक्सर आधा सच , झूठ के बराबर होता है.लोग उसे अपने अपने नजरिये अनुचार समझते है और अर्थ का अनर्थ हो जाता है.और हम भी या कोई भी ज्यादातर बाते करते समय पूरी व्याख्या नहीं करते,की बात किस सन्दर्भ में हो रही है.         

 हमारा स्वभाव है,की अक्सर हम किसी की बातो का गलत मतलब ही निकालते है. क्योकि हम बातो को समज कर उसका मतलब नहीं निकालते , बल्कि हम व्यक्ति को देखकर , उसके हाव भाव देख कर,  उसके साथ हमारे संबंधो को देखकर, उसकी इमेज के अनुचार ही उसकी बातो का मतलब निकाल लेते है. अगर हमारे बिच में कोई किसी की बातो को सकारात्मक तरीके से समझने/ समझाने  की कोशिश करता है तो भी उसे नकार देते है या उससे सहमत नहीं होते, क्योकि हमारे आस पास का माहोल ही ऐसा होता है , जो हमे गलत नजरिये से देखने को प्रेरित करता है.

 अक्सर हम सोचते है की हम दोस्तों में, या अन्य लोगो में बहुत कुछ बोल कर अपनी छाप छोड़ देंगे .मगर ऐसा होता नहीं है.हम नपे - तुले व् कम शब्दों में और खाश अपने आचरण के द्वारा अपनी इमेज बना सकते है.

अक्सर हम कई अलग-अलग जगहों में अलग-२ लोगो के समूह में साथ रहते है.ऐसे अवसरों में भी हमे अपनी बोल चाल,आचरण द्वारा अपनी इमेज की परवाह करनी चाहिए.
 

एक बार फिर की, हम जैसा सोचते है,जो कहना चाहते है,जो कहते है, वैसा ही सामने वाला समझेगा यह जरूरी नहीं है. हमारी इमेज,रिश्ते व् सामने वाले की नियत भी साथ में बोलती है.ऐसा नहीं है की सामने वाला ही गलत करता है, हम भी वैसा ही करते है. तो क्यों ना औरो की बात को सकारात्मक तरीके से सोचने/ समझने की शुरुआत हम खुद से करे !

Why Fear About Death, Before Death So Many Things in Life.

मौत खड़ी है हर दर  पे, हर इंसान को मरना है !
मौत से फिर घबराना कैसा ,फिर इससे क्या डरना है !

जीवन का वर्क उलट देखो ,पीछे मौत लिखा होगा !
कौन ये जाने किसको पता ,बाद मौत के क्या होगा ! 
जब आएगी मर भी लेंगे ,बिन आये क्यों मरना है !
मौत से फिर घबराना कैसा ,फिर इससे क्या डरना है !

जीते जी क्यों डरे मौत से ,लाजिम जब ये मरना है !
मर जाओ ये बेहतर है, गर इससे डरना है !
बुझदिल का न जीना कुछ ,और न उसका मरना है !
मौत से फिर घबराना कैसा ,फिर इससे क्या डरना है !

डर लगता मौत का जिसको ,बड़ा काम कुछ करने में !
उसके लिए कहता हूँ मैं, क्या फर्क है जीने मरने में !
नींद खुले का नाम है जीवन, आँख लगे का मरना है!
मौत से फिर घबराना कैसा ,फिर इससे क्या डरना है! 

इस जीवन से पहले भी तुम, मर के कही से आये हो !
मरने से फिर इस जीवन , इतना क्यों घबराए हो !
हर जीवन के पहलू है दो , एक जीना ओर एक मरना है !
मौत से फिर घबराना कैसा ,फिर इससे क्या डरना है !

आजादी और जवाबदारी





पतंग का डोर से अलग होना है , आजादी ?
बच्चे का माँ की अंगुली छोड़ना है, आजादी ?
नियम बिना का जीवन है, आजादी ?
बिना कानून का समाज और देश है, आजादी ?
बिना लगाम की जबान है, आजादी ?
दीवार बिना का घर है, आजादी ?
विवाह बिना का संबंध है , आजादी?

आजादी , जवाबदारी और सुरक्षा के साथ जुडी हुई है।

डोर की जवाबदारी और पतंग की सुरक्षा में है, आजादी।
माँ की जवाबदारी और बच्चे की सुरक्षा में है, आजादी।
नियमो की जवाबदारी और जीवन की सुरक्षा में है, आजादी।
कानून की जवाबदारी और समाज/देश की सुरक्षा में है, आजादी।
जबान की जवाबदारी और  रिश्तो की सुुरक्षा में है , आजादी।
दीवारों की जवाबदारी और घर की सुरक्षा में है, आजादी।
विवाह की जवाबदारी और चरित्र की सुरक्षा में है, आजादी।

और
हमारी जवाबदारी और देश की सुरक्षा में ही है ,सच्ची आजादी।

Success V/S Simplicity


जीवन का लक्ष्य बन गया है, मात्र सफलता !
स्कुल -कोलेज के शिक्षण में भी महत्व की है,सिर्फ सफलता।
माँ-बाप भी बच्चे से आशा रखते है, सिर्फ सफलता की।
समाज में भी बोलबाला है ,मात्र सफलता की ।
मित्र वर्ग में भी चर्चा के केंद्र में है ,सिर्फ सफलता ।
प्रचार माध्यम में भी आगे है ,मात्र सफलता।
सरकार भी एवार्ड के लिए देखती है,सिर्फ सफलता।
तब
सरलता के प्रति मन में कोई आकर्षण ही नहीं है?
कहा है , आज सरलता की मांग?
जबकि सरलता तो बंधी है सदगुणों से।
बनना पड़ता है विवेकी ,
अपनानी पड़ती है श्रमावृति,प्रतिष्ठित  करना पड़ता है  प्रेम भाव ,
आत्मसात करना पड़ता है विनय,
संपत्ति को नियंत्रित करना पड़ता है नीतिमत्ता से,
वासना को नियंत्रित करना पड़ता है सदाचार से,
मति को नियंत्रित करना पड़ता है प्रभु आज्ञा से ,
प्रवतियों  को नियंत्रित करना पड़ता है महा पुरुषो की सलाह से।

Power Of Thinking

आज का मानव विचार किये बिना ही अभिप्राय देने की शहंशाही भोग रहा है ।
इंसान की महान शक्ति है विचार । विचार के जैसा ही मनुष्य का व्यक्तित्त्व होता है.इसलिए मनुष्य को वैचारिक शुद्धी की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। शुद्ध विचार यह मनुष्य का आंतरिक सौंदर्या है।
विचारवंत मनुष्य बुद्ध भी बन सकता है .और संहारक युद्ध भी खडा कर सकता है। विचारों के सहारे मनुष्य अपने मनोजगत को दिव्या भी बना सकता है और दानवीर भी। योग्य निर्णय के लिए वैचारिक व्यायाम की इसीलिएजरुरत है। विवेक युक्ता वैचारिक व्यायाम मनुष्या को निर्मल विचार यात्री बनाता है। यानी पुरे भ्रमांड में विचार सेज्यादा शक्तिशाली कोई नहीं है। साहित्य ,संगीत ,कला,अध्यात्म , विज्ञानिक आविष्कार ये सब विचारों से ही हमें मिले है। मगर यह भी सच है की विचार सर्जन भी कर सकता है और संहार भी कर सकता है।
इंसान धन से गरीब होता है .इसी प्रकार विचार की दृष्टी से भी गरीब हो सकता है। विचारों से गरीब व्यक्ति खुद केलिए व् समाज के लिए भी तकलीफ कर सकता है.विचारो से गरीब व्यक्ति ना कभी प्रगति कर सकते है, ना कभीअलग हट कर कुछ नया मार्ग ग्रहण कर सकते है.धन से गरीब ही , विचारो से
गरीब हो ऐसा नहीं है.धन से अमीरभी विचारों से गरीब हो सकता है ।
इंसान रातो रात अमीर बन सकता है.मगर रातोरात विचार
शील नहीं बन सकता. आज का मनुष्य विचार बिना हीअभिप्राय देते रहता है.यह भी सामजिक जीवन के लिए अभिशाप है।
मगर ........सावधान ! विचारों की अजिर्नता , भोजन की अजिर्नता से भी ज्यादा खतरनाक है।