What we talk, They not carry same .
हम क्या बोलते है, और क्या पहुंचता है!
. अक्सर हम समझते है की हम जो बाते कहते है सामने वाला भी वैसे ही समझता है. मगर कई बार ऐसा नहीं होता . हम अपने आत्म विश्वास (Self Confident ),नए विचारों के द्वारा अपनी बात सबके साथ करते है. मगर सामने वाले की समझ , उसके ज्ञान , और उसकी नियत पर आधार रखता है की वह हमारी बातो को किस प्रकार से समझता है और उसका क्या मतलब निकालता है.
अपनी सोच के दायरे के अनुचार वह हमारी बात करने के तरीके का , हमारे खुल्ले पण का मतलब निकाल लेता है. हम जो वाद ( Debate ) किसीके साथ करते है, वह सामने वाला अपने अनुचार सुनता है, समझता है और कभी कभी बुरे तरीके से दूसरो के साथ बांटता भी है. इससे ऐसे आधे अधूरे सोच -समझ वाले व्यक्तियों के साथ नुकशान हमारा ही है.
यह हमारी जवाबदारी (Responsibility) बन जाती है, की हम लोगो को देखकर , उसकी समझ व् नियत को जान कर उससे बाते करे . किससे कितनी गहरी बाते करनी चाहिए यह हमे समझना होगा.हमारा मन साफ़ होने से कुछ नहीं होता। सामने वाले का मन और समझ साफ़ होनी चाहिए. अगर सामने वाले का मन, समझ साफ़ होगी तो अगर हमसे कोई गलती हो भी जाए तो वह उसे सुधार लेगा.मगर हम लोगो को कितना समझते , जानते है ,यह बड़ा प्रश्न है
इसलिए यह जरुरी है की किस माहोल में,कैसे लोगो के साथ कितना खुलना है , यह निर्णय काफी सोच-समज के साथ लेना होगा. हमे यह भी ध्यान रखना होगा की हम अपनी गोपनीय बातो को, दूसरो के साथ अपने संबंधो को , अपनी सफ़र की जानकारी वगैरे को कैसे लोगो के साथ बाँट रहे है.
अक्सर आधा सच , झूठ के बराबर होता है.लोग उसे अपने अपने नजरिये अनुचार समझते है और अर्थ का अनर्थ हो जाता है.और हम भी या कोई भी ज्यादातर बाते करते समय पूरी व्याख्या नहीं करते,की बात किस सन्दर्भ में हो रही है.
हमारा स्वभाव है,की अक्सर हम किसी की बातो का गलत मतलब ही निकालते है. क्योकि हम बातो को समज कर उसका मतलब नहीं निकालते , बल्कि हम व्यक्ति को देखकर , उसके हाव भाव देख कर, उसके साथ हमारे संबंधो को देखकर, उसकी इमेज के अनुचार ही उसकी बातो का मतलब निकाल लेते है. अगर हमारे बिच में कोई किसी की बातो को सकारात्मक तरीके से समझने/ समझाने की कोशिश करता है तो भी उसे नकार देते है या उससे सहमत नहीं होते, क्योकि हमारे आस पास का माहोल ही ऐसा होता है , जो हमे गलत नजरिये से देखने को प्रेरित करता है.
अक्सर हम सोचते है की हम दोस्तों में, या अन्य लोगो में बहुत कुछ बोल कर अपनी छाप छोड़ देंगे .मगर ऐसा होता नहीं है.हम नपे - तुले व् कम शब्दों में और खाश अपने आचरण के द्वारा अपनी इमेज बना सकते है.
अक्सर हम कई अलग-अलग जगहों में अलग-२ लोगो के समूह में साथ रहते है.ऐसे अवसरों में भी हमे अपनी बोल चाल,आचरण द्वारा अपनी इमेज की परवाह करनी चाहिए.
एक बार फिर की, हम जैसा सोचते है,जो कहना चाहते है,जो कहते है, वैसा ही सामने वाला समझेगा यह जरूरी नहीं है. हमारी इमेज,रिश्ते व् सामने वाले की नियत भी साथ में बोलती है.ऐसा नहीं है की सामने वाला ही गलत करता है, हम भी वैसा ही करते है. तो क्यों ना औरो की बात को सकारात्मक तरीके से सोचने/ समझने की शुरुआत हम खुद से करे !