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My Dear Daughter !( Hindi)

                                                बेटी चली ससुराल !


प्रिय बेटी जीनल ,                                                            08 /02/15

अपने इस घर में तुम सुरक्षित ,निश्चिंत और आजादी का जीवन बिता रही थी । आज तुम अपना नया आशियाना बसाने जा रही हो इस अवसर पर हम तुमसे कुछ ख़ास बाते बताना चाहते  है, अपने माता -पिता की ये बाते ध्यान से सुनना और समझना  

What we talk, They not carry same .

                                 हम क्या बोलते है, और क्या पहुंचता है!  


                                   .            अक्सर हम समझते है की हम जो बाते कहते है सामने वाला भी वैसे ही समझता है. मगर कई बार ऐसा नहीं होता . हम अपने आत्म विश्वास (Self  Confident ),नए विचारों के द्वारा अपनी बात सबके साथ करते है. मगर सामने वाले की समझ , उसके ज्ञान , और उसकी नियत पर आधार रखता है की वह हमारी बातो को किस प्रकार  से समझता है और उसका क्या मतलब निकालता है. 

अपनी सोच के दायरे के अनुचार वह हमारी बात करने के तरीके का , हमारे खुल्ले पण का मतलब निकाल लेता है.  हम जो वाद ( Debate ) किसीके साथ करते है, वह सामने वाला अपने अनुचार सुनता है, समझता है और कभी कभी बुरे तरीके से दूसरो के साथ बांटता भी है. इससे ऐसे आधे अधूरे सोच -समझ वाले व्यक्तियों के साथ नुकशान हमारा ही है.

 यह हमारी जवाबदारी (Responsibility)  बन जाती है, की हम लोगो को देखकर , उसकी समझ व् नियत को जान कर उससे बाते करे . किससे कितनी गहरी बाते करनी चाहिए यह हमे समझना होगा.हमारा मन साफ़ होने से कुछ नहीं होता। सामने वाले का मन  और समझ साफ़ होनी चाहिए. अगर सामने वाले का मन, समझ साफ़ होगी तो अगर हमसे कोई गलती हो भी जाए तो वह उसे सुधार लेगा.मगर हम लोगो को कितना समझते , जानते है ,यह बड़ा प्रश्न है                                            

इसलिए यह जरुरी है की किस माहोल में,कैसे लोगो के साथ कितना खुलना है , यह निर्णय काफी सोच-समज के साथ लेना होगा. हमे  यह भी ध्यान रखना होगा की हम अपनी गोपनीय बातो को, दूसरो के साथ अपने संबंधो को , अपनी सफ़र की जानकारी वगैरे को कैसे लोगो के साथ बाँट रहे है.
 

अक्सर आधा सच , झूठ के बराबर होता है.लोग उसे अपने अपने नजरिये अनुचार समझते है और अर्थ का अनर्थ हो जाता है.और हम भी या कोई भी ज्यादातर बाते करते समय पूरी व्याख्या नहीं करते,की बात किस सन्दर्भ में हो रही है.         

 हमारा स्वभाव है,की अक्सर हम किसी की बातो का गलत मतलब ही निकालते है. क्योकि हम बातो को समज कर उसका मतलब नहीं निकालते , बल्कि हम व्यक्ति को देखकर , उसके हाव भाव देख कर,  उसके साथ हमारे संबंधो को देखकर, उसकी इमेज के अनुचार ही उसकी बातो का मतलब निकाल लेते है. अगर हमारे बिच में कोई किसी की बातो को सकारात्मक तरीके से समझने/ समझाने  की कोशिश करता है तो भी उसे नकार देते है या उससे सहमत नहीं होते, क्योकि हमारे आस पास का माहोल ही ऐसा होता है , जो हमे गलत नजरिये से देखने को प्रेरित करता है.

 अक्सर हम सोचते है की हम दोस्तों में, या अन्य लोगो में बहुत कुछ बोल कर अपनी छाप छोड़ देंगे .मगर ऐसा होता नहीं है.हम नपे - तुले व् कम शब्दों में और खाश अपने आचरण के द्वारा अपनी इमेज बना सकते है.

अक्सर हम कई अलग-अलग जगहों में अलग-२ लोगो के समूह में साथ रहते है.ऐसे अवसरों में भी हमे अपनी बोल चाल,आचरण द्वारा अपनी इमेज की परवाह करनी चाहिए.
 

एक बार फिर की, हम जैसा सोचते है,जो कहना चाहते है,जो कहते है, वैसा ही सामने वाला समझेगा यह जरूरी नहीं है. हमारी इमेज,रिश्ते व् सामने वाले की नियत भी साथ में बोलती है.ऐसा नहीं है की सामने वाला ही गलत करता है, हम भी वैसा ही करते है. तो क्यों ना औरो की बात को सकारात्मक तरीके से सोचने/ समझने की शुरुआत हम खुद से करे !

Power Of Thinking

आज का मानव विचार किये बिना ही अभिप्राय देने की शहंशाही भोग रहा है
इंसान की महान शक्ति है विचार । विचार के जैसा ही मनुष्य का व्यक्तित्त्व होता है.इसलिए मनुष्य को वैचारिक शुद्धी की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। शुद्ध विचार यह मनुष्य का आंतरिक सौंदर्या है।
विचारवंत मनुष्य बुद्ध भी बन सकता है .और संहारक युद्ध भी खडा कर सकता है। विचारों के सहारे मनुष्य अपने मनोजगत को दिव्या भी बना सकता है और दानवीर भी। योग्य निर्णय के लिए वैचारिक व्यायाम की इसीलिएजरुरत है। विवेक युक्ता वैचारिक व्यायाम मनुष्या को निर्मल विचार यात्री बनाता है। यानी पुरे भ्रमांड में विचार सेज्यादा शक्तिशाली कोई नहीं है। साहित्य ,संगीत ,कला,अध्यात्म , विज्ञानिक आविष्कार ये सब विचारों से ही हमें मिले है। मगर यह भी सच है की विचार सर्जन भी कर सकता है और संहार भी कर सकता है।
इंसान धन से गरीब होता है .इसी प्रकार विचार की दृष्टी से भी गरीब हो सकता है। विचारों से गरीब व्यक्ति खुद केलिए व् समाज के लिए भी तकलीफ कर सकता है.विचारो से गरीब व्यक्ति ना कभी प्रगति कर सकते है, ना कभीअलग हट कर कुछ नया मार्ग ग्रहण कर सकते है.धन से गरीब ही , विचारो से
गरीब हो ऐसा नहीं है.धन से अमीरभी विचारों से गरीब हो सकता है ।
इंसान रातो रात अमीर बन सकता है.मगर रातोरात विचार
शील नहीं बन सकता. आज का मनुष्य विचार बिना हीअभिप्राय देते रहता है.यह भी सामजिक जीवन के लिए अभिशाप है।
मगर ........सावधान ! विचारों की अजिर्नता , भोजन की अजिर्नता से भी ज्यादा खतरनाक है।