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अपनी व्यवस्था खुद कर लेंगे।


कुछ दिन पहले एक लेख पढ़ा था। जिसमे एक उदारवादी बुजुर्ग कह रहे थे की, "माँ बाप ने बच्चो के लिए जो किया वैसे ही बच्चो को भी माँ बाप के लिए अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए", ऐसा कहकर माँ बाप को स्वार्थी नही बनना चाहिए। बच्चो पर जिम्मेदारियों का बोझ डालकर उनको जीवन मे आगे बढ़ने मे रुकावट नही बनना चाहिए। बच्चे अपने भविष्य के लिए जहा जाना चाहे उसे जाने देना चाहिए। और बच्चो के भरोसे क्यो रहना अपनी व्यवस्था खुद कर लेनी चाहिए। 

जब शरीर जवान हो, जेब पैसो से भरा हुआ हो, तब ऐसा ही लगता हैं की बच्चो के भरोसे क्यो रहना? अपनी व्यवस्था हम खुद कर लेंगे।

 मगर जब बुढ़ापे के साथ गंभीर बिमारियाँ शरीर को घेर लेती हैं,  खुद का कार्य भी करने मे शरीर असहाय होता हैं, बैंक बैलेंस पूरी हो मगर पुत्र या पुत्री परिवार साथ ना हो। खास कर तब, जब एक जीवन साथी साथ छोड़ चुका हो तब  अपनी व्यवस्था खुद कर लेंगे की सारी हेकडी निकल जाती हैं। 

कम पैसो के रहते भी, अपने बुढ़ापे के लिए स्वार्थी ना बनकर  धन को सुरक्षित ना रख कर अपने बच्चो को योग्य बनाने और उनकी सुविधा को पूरी करने मे अपना सारा धन लुटाने वाला कैसे कह सकता हैं? की,  अपनी व्यवस्था खुद कर लेंगे। 

 ये ना स्वार्थ हैं ना ही एहसान हैं।  बल्कि परस्पर के कर्तव्य हैं। कुछ कर्तव्य कहने के नही होते, निभाने के होते हैं।


कुछ साल पहले (लगभग 2016-17 के आस पास) की मुंबई की एक सत्य घटना  - एक  रइस बुढी औरत मुंबई के पोश एरिया के अपने विशाल फ्लैट मे अकेले रहती थी उसका बेटा US मे रहता था।  कई दिनों से फोन पर कांटैक्ट ना होने से, बेटा पता करने भारत आया,  दरवाजा ना खुलने पर किसी भी तरह खोल कर देखा तो बुढी माँ मरी हुई पड़ी थी, उसको मरे कई दिन हो चुके थे। 

अब बताओ वो की गई व्यवस्था कहाँ गयी? किस तरह से अंत हुआ होगा उस माँ का? मुंबई मे ही ऐसी कई घटना होती हैं की रईस बुजुर्ग अकेले रहते हैं, और नौकर या कोई अन्य उनकी हत्या करके लूट जाता हैं। 

आप कोई भी बड़े तुर्रम खाँ क्यो ना हो,  बचपन हो या बुढ़ापा, पैसा नही आपका अपना कोई साथ हो तो ही शुकुन देता हैं।  नही तो बुढ़ापे मे भी लावारिश हो सकते हैं। 

आप अपने बच्चो के लिए जो कर सकते हैं जरूर करे,  अपने बुढ़ापे के लिए पैसो की व्यवस्था भी हो सके तो करके रखे।  मगर बच्चो मे ऐसे संस्कारो का सिंचन जरूर करे और खुद अपने माँ बाप का ख्याल रख कर बच्चो को भी ऐसा विवेक दे की, कितनी भी कामयाबी पा लो "माँ- बाप" को नही भूलना है। उसे "स्वार्थ कह लो या संस्कार" अपनी अपनी सोच हैं।

सबरीमला की तरह जैन धर्म मे महिलाओं के मंदिरो मे प्रवेश पर संपूर्ण प्रतिबंध क्यो नही ?

    *सबरीमला की तरह जैन धर्म मे महिलाओं के मंदिरो मे प्रवेश पर  संपूर्ण प्रतिबंध क्यो नही ?*

अभी अभी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया की सबरीमला के मंदिर मे महिलाओ को प्रवेश मिलेगा,  इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने शनिश्वर मंदिर मे महिलाओं के पुजा करने पर और हाजीअली मस्जिद मे प्रवेश के प्रतिबंध  को खारिज किया था। 

आखिर क्यो इन पवित्र स्थलो पर महिलाओं के लिए रोक थी? क्या ये महिलाओं के साथ अन्याय था या कुछ और? 

सबरीमाला मंदिर मे 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था।  क्योंकि ये  उम्र महिलाओं  के लिए मासिक धर्म का समय होता है। विधाता ने महिलाओं की शारीरिक रचना इस प्रकार की हैं कि महीने के कुछ दिन अशुद्धि के रहते हैं। 

 सदियों से लगभग हर धर्म मे  यह परंपरा रही है की अशुद्धता पुर्वक पवित्र स्थलों मे प्रवेश वर्जित/ निषेध माना गया हैं और मासिक धर्म के समय को तो सबसे ज्यादा अशुद्ध माना जाता हैं। 

मगर कई जगह महिलाओं मे जब इसका स्वेच्छा से पालन बंद होने लगा तो सबरीमाला जैसे बड़े तीर्थो मे महिलाओं के प्रवेश पर ही पूर्ण रूप से प्रतिबंध लग गया। 

अब एक उदाहरण जैन धर्म का देखते हैं।  कहते हैं जैन धर्म मे सूक्ष्मता से आचरण के पालन पर जोर दिया जाता हैं।  मगर किसी भी जैन तीर्थ या मंदिर मे महिलाओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध नही है क्योंकि जैन धर्म मे महिलाएँ स्वेच्छा से इन अशुद्धि के दिनों का और उसके आगे पीछे के दिनों का पालन करती हैं।  कम से कम पवित्र स्थलों के लिए तो पूर्ण ख्याल रखा जाता है। 

जब समानता के नाम पर हर नियमो की धज्जियां उड़ाई जाती हैं, तब ऐसे घर्षण पैदा होते हैं। जब कुदरत ने ही पुरूष और महिला के शारीरिक रचना मे फर्क रखा हैं तो किस बात का विरोध?  जहाँ कहीं कही महिलाओं को पीछे रखा हैं तो सम्मान मे कई जगह महिलाओं को पुरुषों से आगे रखा हैं। 

जहाँ तक कानूनी जीत की बात हैं,  कानून उसी प्रकार से फैसला दे सकता हैं जो धाराएँ संविधान मे लिखी हैं। फिर चाहे वो मनमर्जी के अनैतिक रिश्ते रखने की बात हो या कुछ और। हर व्यक्ति को समानता का अधिकार,  हर कोई अपनी मर्जी से जी सकता हैं।  न्याय देने वाले इन धाराओं मे बंधे होते हैं। 

धाराएँ /संविधान अच्छे के लिए ही बनाई जाती हैं मगर कभी कभी उसका गलत उपयोग भी हो सकता है। 

मगर इंसान को कभी कभी अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेकर खुद पर स्वेच्छा से बंदिश लगानी चाहिए। 

जिन्हे मासिक धर्म के समय काल मे कुछ भी अशुद्धता नही लगती उन्हे इस विज्ञान को  गहराई से जानने की विनंती हैं। 

अपनी व्यवस्था खुद कर लेंगे

जब शरीर जवान हो, जेब पैसो से भरा हुआ हो, तब ऐसा ही लगता हैं की बच्चो के भरोसे क्यो रहना? अपनी व्यवस्था हम खुद कर लेंगे।

 मगर जब बुढ़ापे के साथ गंभीर बिमारियाँ शरीर को घेर लेती हैं,  खुद का कार्य भी करने मे शरीर असहाय होता हैं, बैंक बैलेंस पूरी हो मगर पुत्र या पुत्री परिवार साथ ना हो। खास कर तब, जब एक जीवन साथी साथ छोड़ चुका हो तब  अपनी व्यवस्था खुद कर लेंगे की सारी हेकडी निकल जाती हैं। 

कम पैसो के रहते भी, अपने बुढ़ापे के लिए स्वार्थी ना बनकर  धन को सुरक्षित ना रख कर अपने बच्चो को योग्य बनाने और उनकी सुविधा को पूरी करने मे अपना सारा धन लुटाने वाला कैसे कह सकता हैं? की,  अपनी व्यवस्था खुद कर लेंगे

 ये ना स्वार्थ हैं ना ही एहसान हैं।  बल्कि परस्पर के कर्तव्य हैं। कुछ कर्तव्य कहने के नही होते, निभाने के होते हैं।


कुछ साल पहले की मुंबई की एक सत्य घटना  - एक  रइस बुढी औरत मुंबई के पोश एरिया के अपने विशाल फ्लैट मे अकेले रहती थी उसका बेटा US मे रहता था।  कई दिनों से फोन पर कांटैक्ट ना होने से एक बार बेटा पता करने भारत आया,  दरवाजा ना खुलने पर किसी भी तरह खोल कर देखा तो बुढी माँ मरी हुई पड़ी थी, उसको मरे कई दिन हो चुके थे। 

अब बताओ वो की गई व्यवस्था कहाँ गयी? किस तरह से अंत हुआ होगा उस माँ का? मुंबई मे ही ऐसी कई घटना होती हैं की रईस बुजुर्ग अकेले रहते हैं, और नौकर या कोई अन्य उनकी हत्या करके लूट जाता हैं। 

आप कोई भी बड़े तुर्रम खाँ क्यो ना हो,  बचपन हो या बुढ़ापा, पैसा नही आपका अपना कोई साथ हो तो ही शुकुन देता हैं।  नही तो बुढ़ापे मे भी लावारिश हो सकते हैं। 

आप अपने बच्चो के लिए जो कर सकते हैं जरूर करे,  अपने बुढ़ापे के लिए पैसो की व्यवस्था भी हो सके तो करके रखे।  मगर बच्चो मे ऐसे संस्कारो का सिंचन जरूर करे और खुद अपने माँ बाप का ख्याल रख कर बच्चो को भी ऐसा विवेक दे की, कितनी भी कामयाबी पा लो "माँ- बाप" को नही भूलना है। उसे "स्वार्थ कह लो या संस्कार" अपनी अपनी सोच हैं।