हम बहादुरी को हमेशा युद्ध मोर्चे के सन्दर्भ में ही देखते है . जीवन के छोटे - मोटे कार्यो में हम कितनी द्रढता ,कितने परिश्रम प्रियता ,कितनी निष्ठा और कितना आत्म बल दिखाते है उसका कभी विचार या ऐसा आत्म दर्शन करने की हमे आदत नहीं होती . इससे दुःख शब्द मात्र के आने पर उससे दूर भागने का मौक़ा कैसे मिले ऐसी चिंता शुरू हो जाती है.
जीवन की सहज यात्रा में धुप छाव के प्रसंग तो आयेंगे ही . मनुष्य को छाया ही मिले ऐसी इच्छा हमेशा क्यों रखनी चाहिए ? "प्रवासी" यानी पसंदगी के सुखो की अपेक्षा नहीं रखने वाला मनमोजी यात्री . सरलता से मिलने वाले सुख इन्सान की मर्दानगी छीन लेते है. इसलिए दुखो को जीवन विधायक शिक्षक माना जाता है. प्रचंड पुरुषार्थ ही आफतो को ,मुश्किलो को पीछे धकेलने का रास्ता है!
जीवन तो चन्दन के वृक्ष जैसा है. उगने की स्थिति में उसकी महक का अनुभव नहीं होता , मगर कुल्हाड़ी का वार ही उसकी सुगंध के प्रचार का निमित बनता है . संकटों का भी ऐसा ही है,यह हमे हिला कर रख देता है,मगर जगाता भी है और शक्ति संचय के लिए संकल्पबद्ध बनने का मौका देता है. संघर्षो के सामने मुकाबला करने की शक्ति देता है. बुद्धि और प्रतिभा के विकास के लिए इसके द्वारा वातावरण बनता है.
सही में तो " श्राप" ,संकट भी एक वरदान है,क्यों की यह एक चेलेंज है.
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